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कृष्णा, जसंच्या तसं……

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O LORD, my adoration rises ardently to Thee, all my being is an aspiration, a flame consecrated to Thee.*
Lord, Lord, my sweet Master, it is Thou who livest and willest in me!
This body is Thy instrument; this will is Thy servant; this intelligence is Thy tool; and the whole being is only Thyself.
Apri 4 , 1914
The Mother
(CWM-1, p. 118)

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कृष्णा,
संबंध माझा या जगाशी
तरी का स्मरावी
आज मज काशी
भाग्यरेषांसवे माझ्या
का आज बोले निराळे
काहीतरी या नक्षत्र राशी
ब्रह्मपुत्रेला भेटावया
का जीवाची कासावीशी
हाक येताच तिची
पोहोचेल का रे क्षणार्धात
मी तिच्या तीराशी
कृष्णा, सांग ना…

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श्रीकृष्णार्पणमस्तु!


कर्म

कर्म ही सत्य, कर्म ही शाश्वत ।
कर्म से जीवन महान ।
कर्म से ईश्वर की प्राप्ति,
कर्म मिटा दे अभिमान ।

कर्म ही पूजा, कर्म परिवार ।
कर्म आस- विश्वास ।
कर्म दया है, कर्म धर्म,
कर्म से मिले चैन की साँस ।

कर्म में माँ- बाप की दुआ,
कर्म मे ही शांति- संस्कार ।
कर्म से होता मान सर्वत्र,
कर्म में समाया सृष्टि का प्यार ।

कर्म बिना जीवन शून्य,
कर्म से कण-कण में रंग ।
कर्म से धरा-गगन सुशोभित,
कर्म से मिटें सदियों के जंग ।

कर्म मिटाए सारे भेद,
कर्म से हर रिश्ता पावन ।
कर्म डाल दे मृत में जान,
कर्म से हर पल हरियाला सावन ।

कर्म ही ज्ञान- विद्या- प्रकाश,
कर्म से सच्ची पहचान ।
कर्म बिना सृष्टि सूनी,
कर्म से जीतें- जहान ।

कर्म ही भक्ति और साधना,
कर्म गंगा की भांति निर्मल ।
कर्म से सदा रहते स्वस्थ,
कर्म करें हम सदैव निश्छल ।

कर्म से रहते सदा जवान,
कर्म से आशावादी ।
कर्म से हर पल आनन्द,
कर्म से रुके बर्बार्दी ।

कर्म ही विनय- विवेक- विचार,
कर्म से बनें संत – शैतान ।
जिसने कर्म के मर्म को जाना,
पा लिया गीता का ज्ञान ।

कर्म ही आदि और अन्त,
कर्म हर जीव का गहना ।
दृढ़ निश्चय से कर पावन कर्म,
सुख-दुःख आ जाए सम सहना ।

चन्द्रवती दीक्षित
करनाल / हरियाणा



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