

डॉ. गोरख प्रभाकर काकडे
सहयोगी प्राध्यापक,
सरस्वती भुवन कला एवं वाणिज्य
महाविद्यालय, औरंगाबाद महाराष्ट्र
मोबाइल नं. : ९०११४३६१४४/७५८८९३४४७४
ई-मेल : dr.gorakhkakade@gmail.com
शिक्षा : एम.ए.,बी.एड,सेट,नेट(JRF),पी-एच्.डी.
• विशेषज्ञता : अनुवाद, दलित-आदिवासी साहित्य
• पिछले 15 वर्षां से – हिंदी भाषा और साहित्य के अध्यापन, अनुसंधान का अनुभव
• प्रकाशित पुस्तकें : 07
• मराठी-हिंदी, हिंदी-मराठी चार पुस्तकों का अनुवाद
• विश्वविद्यालय अनुदान आयोग दिल्ली की ओर से अनुदान प्राप्त एक बृहद शोध परियोजना
• विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर अनेक शोध-आलेख, अनुवाद प्रकाशित
• अनेक राष्ट्रीय, अंतर्रराष्ट्रीय संगोष्ठियों, परिसंवादों, संमेलनों में स्त्रोत व्यक्ति के रूप में मार्गदर्शन
• राष्ट्रीय, अंतर्रराष्ट्रीय संगोष्ठियों, परिसंवादों, संमेलनों में अनेक शोध-आलेखों का पठन
• शोध-मार्गदर्शन में एक छात्रा को पी-एच्.डी. की उपाधि प्राप्त और चार शोध-छात्रों का पी-एच्.डी. के लिए शोध कार्य जारी
• आकाशवाणी से विभिन्न विषयों पर अनेक भाषण/रूपक, अनुवाद प्रसारित
अमृत वाणी
कल के समारोह में कई लोगों को सुना। उनमें विश्वकोश मंडळ के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं इतिहास के प्राध्यापक डॉ. राजा दीक्षित, वरिष्ठ आलोचक डॉ. प्रभाकर बागले, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष डॉ. मिलिंद मराठे जैसे प्रख्यात व्यक्ति शामिल थें। जब इन लोगों ने अपने भाषणों में सर के कर्तृत्व का गुणगान करते हुए उनका बड़प्पन और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। यह लोग बडी विनम्रता के साथ अपनी भावनाओं को उजागर कर रहे थें। तब मुझे दृढ़ता से महसूस हुआ कि, “हम कितने भाग्यशाली हैं!” जो हम एक ऐसे समय में हैं जहां हमें दादा और नातियों के बीच का सार्वजनिक और सांस्कृतिक जीवन का भरसक प्यार मिला है।आशीर्वाद मिला है। जिसकी अनुभूति का कारण बने हमारे रसाळ सर।
मुझे याद है कि सर सन् 1994 में सेवानिवृत्त हुए उस समय मैं दसवीं कक्षा में थी। मेरे पिताजी मुझे सर के सम्मान में आयोजित सम्मान समारोह में ले गए थे, जो सरस्वती भुवन शिक्षण संस्था के जालान हॉल में संपन्न हुआ था। मेरे पिताजी का मानना था कि इसी उम्र में अच्छे लोगों को सुनने के संस्कारों का बच्चों पर होने आवश्यक है। उस समय मुझे सर को सुनने का पहला अवसर मिला। सर का पहला वाक्य था, “पता नहीं मुझे क्यों सम्मानित किया जा रहा है, क्योंकि मैंने पढ़ाकर कुछ ख़ास अलग नहीं किया है। मैंने तो बस अपना कर्तव्य पूरा किया है। मैंने इसके लिए तनख्वाह ली है, इसमें सम्मानित करने जैसी क्या बात है?” और उस दिन से लेकर आज तक हम देखते आ रहे हैं; यह व्यक्ति कभी रिटायर नहीं हुआ। ज्ञान का यज्ञ तपस्या की तरह अविरत चल रहा है। हम सर को देख रहे हैं, सर को सुन रहे हैं, सर के ज्ञान यज्ञ को क़रीब से अनुभव कर रहे हैं।
कल मेरे जीवन का एक बहुत ही सुंदर दिन था। मुझे एक पल के लिए भी थकान महसूस नहीं हुई। मैंने इस आनंद का अनुभव किया कि ‘आवश्यकता’ के दबाव की तुलना में ‘आवश्यकता’ का आकर्षण कितना सुंदर है; कल का दिन मेरे लिए सचमुच यादगार रहा, और हमेशा रहेगा। मैं सुबह आठ बजे कॉलेज गई और रात को नौ बजे घर लौटी, परंतु लौटते समय मैं ऊर्जा का एक अक्षत भंडार लेकर घर पहुंची।
रोजमर्रा का काम चल रहा था। बाद में सर्टिफिकेट कोर्स की तासिका हुई और मैं और मेरी सहयोगी सहेली सर के सम्मान समारोह की प्रतीक्षा करती हुई अन्य कामों में लगी रही। मैं और मेरी सहेली साढ़े पाँच बजे सीधे कॉलेज के थिएटर में पहुंची। हमारे सर, हमारे भगवान पहले ही वहां पर पहुंच चुके थे। हमने अपने भगवान के चरण स्पर्श किए, उनसे मिले। हमें उन्हें देखकर अपार खुशी हुई। और हम थियेटर में जाकर बैठ गए। सम्मान समारोह निश्चित समय से थोड़ी देर से शुरू हुआ परंतु यह समारोह रसाळ सर के सन्मान में था; इसलिए मेरे मन में देरी, कमियों, त्रुटियों के बारे में कोई भी शिकायत नहीं थी। इच्छा थी केवल उन्हें सुनने की।
जब सर को ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार मिला, तो हम उन्हें बधाई देने उनके घर गए और उनसे कहा, “सर, आप कितना काम करते हैं!” सर ने एक वाक्य में कहा, “अगर काम खत्म तो समझो आदमी भी खत्म”। हे भगवान, मैं आपकी बहुत-बहुत आभारी हूँ कि ‘कलियुग’ नामक इस युग में भी आपने ‘कथनी और करनी’ जिनकी एक हो ऐसे लोगों को हमारे अनुभव और हमें आशीर्वाद देने के लिए रखा है। जिनके सामने अपने आप हमारे हाथ जुड़ जाते हैं और हमारा सिर नतमस्तक होने के लिए झुकता है।
मैं वास्तव में आभारी हूँ। सर के आशीर्वाद और प्रोत्साहन के लिए। आपकी ही बदौलत सरस्वती भुवन में ‘जांभळी तांडा’ (गावं का नाम) यह परियोजना चलाई गई, कवि नारायण सुर्वे के निधन पर मैंने एक ‘रूपक’ लिखा और उसे प्रस्तुत भी किया, मैं स्वर्गीय प्रभाकरराव भालेराव जी की स्मृति में आयोजित ‘पुस्तक परिचय’ प्रतियोगिता की एक तप तक संयोजिका रही। मुझे खुशी है कि यह संभव हुआ आपके मार्गदर्शन और आशीर्वाद के कारण ही। हर बार, आपके शब्दों ने मुझे प्रेरित किया और आगे बढ़ने की शक्ति दी।
अभी परसो ही सरस्वती भुवन में ‘प्रूफरीडिंग एवं मीडिया लेखन’ यह एक सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया है। दरअसल, मेरी बहुत इच्छा थी कि कोर्स शुरू करने से पहले घर जाकर सर का आशीर्वाद लूँ; लेकिन असल में ऐसा संभव नहीं हो पाया। इसलिए, मैंने उन्हें तुरंत फ़ोन किया। मैंने सर से कहा, “सर, मैं असल में कोर्स शुरू करने से पहले आपके पास आना चाहता थी, लेकिन सर मैं क्या कहूँ, आज मेरे पास इतना काम था कि मैं आ नहीं पाई।” सर का मेरे प्रति हमेशा लगाव रहा है। उन्होंने तुरंत कहा, “आप बहुत अच्छा काम कर रही हो, इस काम की बहुत आवश्यकता है। आप यह काम लंबे समय तक करते रहिएगा।” इस अपार आशीर्वाद ने मुझे दस हाथियों का बल दे दिया। कल एक छोटी सी व्यक्तिगत भेंट के बाद मुझे उन्हें फिर से सुनने का सुअवसर मिला। दूसरों को सुनना आनंदप्रद रहा, परंतु अंतिम 12-13 मिनटों में सम्मान समारोह का उत्तर देते समय सर ने जो अमृत वचन हमारे हृदय में बोए वह वचन हर एक मराठी व्यक्ति तक पहुँचाना मैं अपना ‘पवित्र’ और ‘पुण्य’ कर्तव्य मानती हूँ, जिससे अगले कार्य की दिशा स्पष्ट हो गई, तथा प्रत्यक्ष आदेश प्राप्त हुए; इसलिए यह आप तक पहुंचा रही हूँ।
(डॉ. सुधीर रसाळ सर को सोमवार, 11 अगस्त, 2025 को साहित्यिक संस्था ‘मुक्त सृजन’ द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त होन पर ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। यह कार्यक्रम सरस्वती भुवन शिक्षण संस्था के थियेटर में संपन्न हुआ। मैं सर के भाषण के शब्द और भाव आप तक पहुंच रही हूँ।)
सम्मान का उत्तर देते हुए सर ने कहा, “मैं जो कहना चाहता हूँ, उसे मैं कुछ बिंदुओं के रूप में आपके सामने रखूँगा। सबसे पहले, मुझे विशेष रूप से खुशी है कि मुझे यह पुरस्कार एनबीटी के अध्यक्ष के हाथों प्राप्त हुआ, क्योंकि मैं जो सांस्कृतिक समीक्षाएँ लिखता हूँ, उनमें मेरा एक बिंदु यह होता है कि जिस प्रकार साहित्य का एक यूरोपीय कुल है, उसी प्रकार साहित्य का एक भारतीय कुल भी निर्मित होना चाहिए। यदि ऐसा करना है, तो भारतीय भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए। यदि ऐसा करना है, तो एनबीटी के कार्य को बड़े पैमाने पर विकसित किया जाना चाहिए। यह नेहरू जैसे दूरदर्शी व्यक्ति द्वारा स्थापित संस्था है, और उनका एक सपना था भारत की सांस्कृतिक एकता। उसी से, ‘साहित्य अकादमी’ और “नेशनल बुक ट्रस्ट” की स्थापना हुई, और मुझे इस बात की विशेष खुशी है।”
दूसरी बात, ‘मुक्त सृजन’ कार्यकर्ताओं का एक ऐसा संगठन है जो स्व-प्रेरित होकर काम करता है। मैं यहाँ दुर्गा भागवत के विचार को उद्धृत करना चाहूँगा, “सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाली सांस्कृतिक संस्थाएँ सरकार के विरुद्ध, सरकार द्वारा लिए गए गलत निर्णयों के विरुद्ध नहीं बोलतीं, उनमें एक प्रकार का अहंकार होता है। इसलिए, इन सांस्कृतिक संस्थाओं को सरकारी अनुदान लिए बिना ही चलाया जाना चाहिए।” गांधीजी ने कहा था कि ‘महाराष्ट्र’ स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं का आश्रय स्थल है, भारत के अन्य राज्यों में ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिलती, इसलिए उन्होंने अपने प्रतिनिधि को पुणे भेजा ताकि यह अध्ययन किया जा सके कि यह कार्य कैसे किया जाता है। ‘मुक्त सृजन’ एक साहित्यिक संस्था है जो स्व-प्रेरित है। इसलिए, पिछले वर्ष पुरस्कार देते समय मैंने ‘महेश खरात’ की विशेष रूप से प्रशंसा की थी। आज भी, इस साहित्यिक संस्था से पुरस्कार प्राप्त करते समय मुझे थोड़ी झिझक होती है कि ये लोग अपनी जेब से खर्च करके इस संस्था को चलाते हैं, और ऐसी संस्था पर इस पुरस्कार का अतिरिक्त बोझ न डाला जाए। मैंने उनसे कहा, “आपको मुझे यह पुरस्कार बिल्कुल नहीं देना चाहिए। दूसरी बात, इस संस्था द्वारा दिए गए पुरस्कार का स्वीकार करके मैं अपने आप को गौरांवित महसूस कर रहा हूं। इसलिए मैं इस पुरस्कार का स्वीकार कर रहा हूँ।”
मेरा तीसरा बिंदु यह है कि, “महाराष्ट्र अपनी संस्कृति के बारे में बहुत उदासीन राज्य है। यह अपनी भाषा के बारे में बहुत उदासीन है। ‘त्रिभाषा सूत्र’ को लागू किया गया और महाराष्ट्र में संस्कृत सीखने की परंपरा को नष्ट कर दिया गया। इसे ब्राह्मणों की भाषा कह कर उपेक्षित कर दिया गया। कोई भी भाषा किसी एक जाति की नहीं होती। महाराष्ट्र में संस्कृत विद्वानों की बहुत बड़ी परंपरा रही है। आज, महाराष्ट्र में संस्कृत नहीं है, जिसका परिणाम यह है कि मराठी भाषा में विभिन्न नए शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह से समाप्त हो गई है। जो हिंदी में मौजूद है। हिंदी आलोचना में जो नए शब्द, अवधारणाएं आ रहीं हैं, नए शब्द बनाए जा रहे हैं, वह संस्कृत की ही देने हैं। हम अंग्रेजी शब्द लेते हैं और अपना काम चलाते हैं। ‘त्रिभाषा सूत्र’ आया और हमारा नुकसान हुआ।
हिंदी क्षेत्र ने तीन भाषाओं को स्वीकार किया – हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत। हमने तीन भाषाओं को स्वीकार किया – अंग्रेजी, हिंदी और मराठी। उसके बाद, हिंदी को पाँचवीं कक्षा से शुरू किया गया। सभी का एक मत है कि हिंदी को इस देश में एक ‘संपर्क भाषा’ के रूप में रहना चाहिए, और मेरा भी यही मत है। वास्तव में, महाराष्ट्र ने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया। मध्य युग के कई मराठी संतों ने हिंदी में कविताएँ रचीं। सुप्रसिद्ध हिंदी गणपति की आरती मराठी संतों द्वारा लिखी गई है। महाराष्ट्र ने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया। लेकिन जब आप पहली कक्षा से ही हिंदी को लागू करने की कोशिश करते हैं, तो इसका मतलब है, ‘आप मराठी भाषा का अस्तित्व ही मिटाना चाहते हैं’। बच्चे छोटी उम्र में भाषाओं के बीच का अंतर नहीं समझ पाते। छोटे बच्चे मराठी में हिंदी शब्दों का प्रयोग करने लगेंगे। हिंदी में मराठी शब्दों का उपयोग करने लगेंगे। मराठी व्याकरण हिंदी में प्रवेश करेगा और हिंदी व्याकरण मराठी में प्रवेश करेगा। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि मराठी हिंदी की एक ‘उप-भाषा’ बन जाएगी। जिस तरह से ‘बम्बईया हिंदी’ का निर्माण हुआ या महाराष्ट्र में जो ‘दखनी भाषा’ बनी, वह इसी तरह बनी है। जब कई मराठी भाषी मुस्लिम धर्म को स्वीकार करने लगे, तो उन्होंने जो उर्दू बोलना शुरू किया, उसमें मराठी की मात्रा अधिक थी। ‘च’ दखनी भाषा में प्रयुक्त एक (प्रत्यय) है, यह मराठी से आया है। ‘च’ का प्रयोग “मैं खाताच नहीं” के रूप में किया जाता है। मेरी पढ़ाई उर्दू मीडियम से हुई है। हमारे समय में तीसरी कक्षा से ही उर्दू थी। मेरी मराठी उर्दू मिश्रित मराठी है। सन् 1948 में हमारी पीढ़ी ने जानबूझकर अपनी भाषा से उर्दू के शब्द हटा दिए। अगर भाषा को बिगाड़ना हो तो बच्चे को बचपन में ही दूसरी भाषा सिखानी शुरू कर दो; फिर वो किस तरह भाषा का मिश्रण करता है यह देखने लायक बात है। और जैसे आज एक ‘राजस्थानी’ या इस प्रकार की ‘हिंदी बोलियाँ’ हैं, वैसा ही एक रूप मराठी का अगले 50-60 वर्षों में होगा; और तब ‘ज्ञानेश्वर’ और ‘तुकाराम’ के साथ आपका क्या रिश्ता रहेगा? ये आपको सोचना चाहिए।
इसका मतलब है कि इस ‘शिक्षा नीति’ के कारण आपकी पूरी संस्कृति खतरे में है और मराठी लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। वे बड़े आराम से बैठे हैं। दक्षिणी राज्यों की तरह इसका विरोध करने का कोई कारण नहीं है। लेकिन अगर कोई भाषा हमारी संस्कृति पर हमला कर रही है, तो मुझे लगता है कि हमें खड़ा होना चाहिए। और दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं हो रहा है।
आखिरी बात यह है कि अंग्रेजी भाषा और अब हिंदी के कारण मराठी में लेखकों की पीढ़ियाँ तैयार नहीं हो रही हैं। जब मैं 18-20 साल के मराठी कविता लिखने वाले युवाओं के बारे में सोचता हूँ, कि वे कैसे लिख रहे हैं, तो मुझे मराठी में कोई ऐसा युवा लेखक नहीं दिखता जिसमें चमक हो, प्रतिभा हो और जो विकसित हो सके। मुझे बीस या बाईस साल का कोई युवा मराठी लिखते हुए नहीं दिखता। तो, जो पीढ़ी अभी लिख रही है, उनके बाद, क्या उनकी जगह लेने के लिए मराठी में लेखकों का एक नया वर्ग तैयार होगा? अगर ऐसा नहीं होगा, तो मराठी साहित्य का क्या होगा? हम इस बारे में सोचते भी नहीं हैं। आज ‘मराठी साहित्य और संस्कृति’ एक भयानक पतन की ओर अग्रसर है। न तो मराठी लेखकों को और न ही मराठी भाषियों को इसका एहसास है। हर कोई उदासीन है। इस पूरी स्थिति के बारे में कोई एक शब्द भी नहीं बोलता। और जो समाज अपनी संस्कृति के प्रति उदासीन होता है, उसकी कभी भी अपनी ‘संस्कृति’ नहीं होती। जिस क्षण मराठी लोगों की सांस्कृतिक पहचान जागृत होगी, उसी क्षण मराठी भाषा और संस्कृति को गति मिलनी शुरू हो जाएगी। इसलिए इस अवसर पर मुझे लगा कि मैं आपके सामने यह दो-चार बाते रखूं ताकि हमारी मराठी संस्कृति जीवित रहे। जब तक इस बात को लेकर लोगों को एहसास नहीं होगी, यह स्थिति ऐसी ही रहेगी। इसलिए मैं सभी से इस पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ।
मुझे यह पुरस्कार देने के लिए मैं ‘मुक्त सृजन’ संस्था के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। और मुझे यहाँ बोलने का अवसर देने के लिए आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।
आदरणीय सर का भाषण समाप्त हुआ, मेरे मन- मस्तिष्क में कई विचारों को गति देकर…
वृंदा आशय
अनुवाद – डॉ. गोरख प्रभाकर काकडे
सहयोगी प्राध्यापक ,हिंदी विभाग ,
स.भु. कला व वाणिज्य महाविद्यालय