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भावरूप राम

डा. दिनेश प्रताप सिंह

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का जीवन आदर्शों का ज्योतिपुंज है। जिस रूप में भी उन्हें देखा जाए, उसी आदर्श रूप में उन्हें पा सकते हैं। सद्गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवाक, दृढ़व्रत, सदाचारी, सर्वभूतहितकारी, विद्वान, सामर्थ्यवान, प्रियदर्शन, आत्मवान, जितक्रोध, द्युतिमान, अनसूयक और योद्धा गुणों से सम्पन्न प्रभु श्रीराम अपने ओज में श्री, भू, कीर्ति, इला, लीला, कांति, विद्या, विमला, उत्कर्षिणी, विवेक, क्रिया और योगशक्ति इत्यादि कलाओं को धारण करते थे। वे जितने गुण-कलाओं से युक्त थे, उतने ही भावरूपों में उनके दर्शन होते थे। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी।” जिसके मन मे जैसी प्रबल भावना होती है, उसे श्रीराम उसी भावरूप में दिखाई देते हैं। इस भावना से हम उनके दर्शन लेते हैं, उसी भावना से उनके गुण, रूप, चरित्र और भाव का वर्णन भी करते हैं। बाबा तुलसीदास ने “रामचरितमानस” में बताया है, “रामायण शत कोटि अपारा”। जितने भाव, उतने रामायण।

श्रीराम करुनानिधान थे। जिस भी दीन-दुःखी उनका स्मरण किया, प्रभु ने उदारमन से उसका कल्याण किया। किसी के गुण-दोष की मीमांसा नहीं की। सभी शरणागत उनकी कृपा के पात्र बने। उनके अहित की कामना रखने वाले जयंत, मंथरा, कैकेयी और बाली को भी प्रभु ने अपनी कृपा प्रदान की और भक्ति में डूबे सुग्रीव, विभीषण, जटायु, केवट, निषादराज, शबरी और अहल्या का भी जगत में मान बढ़ाया। शबरी को नवधा भक्ति- श्रवण, कीर्तन, संस्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन का ज्ञान देकर सम्पूर्ण मानवता को अध्यात्म का सरल और सहज मार्ग दिखाया। सामान्य जन को ही नहीं, अपितु विश्वामित्र, सतानंद, भारद्वाज, शरभंग, अगत्स्य, अत्रि जैसे ज्ञानी-मनीषी ऋषियों की सुदीर्घ तपस्या को सुफल बनाया।

भगवान श्रीराम आदर्श राजा थे। उनके राज्य में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था, अपितु सबके प्रति प्रेमभाव था। वे भरतीय संस्कृति के आधार और एक आदर्श राजा थे। उनके राज्य में दैहिक-दैविक-भौतिक कष्ट की व्याप्ति ही नहीं थी। सभी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सबके साथ आत्मीयता से रहते थे। प्रभु श्रीराम के प्रताप से समाज में किसी प्रकार की असमानता नहीं थी। कोई निर्धन और दुखी नहीं था। यही नहीं तो कोई बुद्धिहीन, लक्षणहीन और अल्पायु नहीं था।

प्रभु श्रीराम ने लोककल्याण और आदर्शों की स्थापना के लिए ही धराधाम पर अवतार लिया था। समाज और लोकजीवन में व्याप्त कुरीतियों को दूर करके और रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद, खर, दूषण, ताड़का, मारीच, सुबाहु, कबंध इत्यादि आततायियों का विनाश करने के साथ ही अनेक अहंकारियों का उन्होंने मानमर्दन भी किया। वे प्रजावत्सल और लोकतंत्र के रक्षक थे। अपनी राजसभा में दोनों हाथ उठाकर घोषणा की, “जौ अनीति कछु भाखौं भाई। बरजहूँ मोहिं सब भय बिसराई।।” यदि मेरे मुख से कोई अनीति की बात निकले, तो बिना किसी भय के मुझे रोकिये। ऐसा राजा दुनिया में नहीं हुआ, जो स्वयं के ऊपर अपनी प्रजा का अधिकार स्वीकार करता हो। सम्पूर्ण भारत वर्ष को उत्तर से दक्षिण प्रभावित और अनुशासित करने वाले श्रीराम हमारी संस्कृति, सभ्यता, उत्कर्ष और लोकजीवन के उन्नायक हैं। विजयदशमी उनके पराक्रम और शौर्य का परिचायक है। आज विजयदशमी पर्व पर प्रभु श्रीराम को नमन।

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