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राम – भेट

धर्मध्वज – अयोध्या, राममंदिर – दि.२५ नोव्हेंबर २०२५


कल्याणमस्तु !

जाग येता पहाटे | देव अंतरी भेटे

चित्त होई शुद्ध | मन होई प्रबुद्ध

स्व युद्ध घे विराम | अंतरी प्रकटे राम

निर्मल निर्भय निर्झर वाहे | कल्याणमस्तु वदतचि राहे

वृंदा आशय

(नीरव मनातील देवरव – या काव्यसंग्रहातून)


मार्तंड भैरवाचा षड् रात्रोत्सव प्रारंभ झालेला होता, त्यावेळी लिहिलेली ही कविता. कदाचित या उत्सावामुळे उगवत्या सूर्याला पाहून आठवला ‘तो रूद्रांश, तो शिवांश’. पवनपुत्र हनुमंत शिवाचा अंश म्हणून ओळखला जातो. उगवत्या सूर्याला फळ समजून सूर्याकडे झेपावलेल्या बाल – हनुमानाची कथा सर्वपरिचित आहे. रामभक्त हनुमंताचे काव्य शिवचरणी, रामचरणी समर्पित !


तो रूद्रांश तो शिवांश !

निळ्या नभात लाल आभा
सांगे येतोय आदित्य बघा
बघता तो उगवता नित्य
वेड लावतो मज आसमंत
अन् स्मरतो तो हनुमंत !

जो जगताचा संकटमोचक
आहे श्रीरामांचा परमसेवक
पवनवेगे क्षणार्धात येईल
प्रकटेल पुन्हा तो चिरंजीवी
गुण गातील त्याचे महाकवी !

आयुष्य ज्याचे आहे श्रीराम
स्मरेना त्याला दुजे काही काम
अकस्मात प्रकटला अशोकवनी
चिरंजीव झाला हो तो रामायणी
महाभारती कृष्णसेवा ध्वजावरुनी !

अन्याय घडतो जेव्हा जेथ जेथ
तो झेपावतो पुढे रामादेश घेत
असो कोणतेही क्षेत्र अन् काळ
कलियुगीही त्याची हीच धारणा
समर्थ उत्तर देईल सीताहरणा!

वृंदा आशय


धर्म

इस सृष्टि में असंख्य पदार्थ हैं। ये सारे पदार्थ गतिमान हैं। सबकी भिन्न भिन्न गति होती है, भिन्न भिन्न दिशा भी होती है। पदार्थों के स्वभाव भी भिन्न भिन्न हैं। वे व्यवहार भी भिन्न भिन्न प्रकार से करते हैं। फिर भी वे एक दूसरे से टकराते नहीं हैं। परस्पर विरोधी स्वभाव वाले पदार्थों का भी सहजीवन सम्भव होता है। हम देखते ही हैं कि उनका अस्तित्व सृष्टि में बना ही रहता है। इसका अर्थ है इस सृष्टि में कोई न कोई महती व्यवस्था है जो सारे पदार्थों का नियमन करती है। सृष्टि का नियमन करने वाली यह व्यवस्था सृष्टि के साथ ही उत्पन्न हुई है। इस व्यवस्था का नाम धर्म है। इसे नियम भी कहते हैं। ये विश्वनियम है। धर्म का यह मूल स्वरूप है। इस व्यवस्था से सृष्टि की धारणा होती है। इसलिए धर्म कि परिभाषा हुई, ‘धारणाद्धर्ममित्याहुः । धारण करता है इसलिए उसे धर्म कहते हैं।

इस मूल धर्म के आधार पर ‘धर्म’ शब्द के अनेक आयाम बनते हैं ।

पदार्थों के स्वभाव को गुणधर्म कहते हैं। अग्नि उष्ण होती है । उष्णता अग्नि का गुणधर्म है। शीतलता पानी का गुणधर्म है ।

प्राणियों के स्वभाव को धर्म कहते हैं। सिंह घास नहीं खाता । यह सिंह का धर्म है। गाय घास खाती है और मांस नहीं खाती, यह गाय का धर्म है।

यह धर्म विश्वनियम का ही एक आयाम है।

इस प्रकृतिधर्म का अनुसरण कर मनुष्य ने भी अपने जीवन के लिए व्यवस्था बनाई है। इस व्यवस्था को भी धर्म कहते हैं। अर्थात समाज को धारण करने हेतु जो भी अर्थव्यवस्था, राज्यव्यवस्था आदि होती हैं वे व्यवस्थाधर्म है। इस धर्म का पालन करना नीति है। यह नीति भी धर्म कहलाती है।

व्यक्ति की समाजजीवन में विभिन्न भूमिकायें होती हैं। एक व्यक्ति जब अध्यापन करता है तो वह शिक्षक होता है। घर में होता है तो वह पिता होता है, पुत्र होता है, भाई होता है। बाजार में होता है तब वह ग्राहक होता है या व्यापारी होता है। इन सभी भूमिकाओं में उसके विभिन्न स्वरूप के कर्तव्य होते हैं। इन कर्तव्यों को भी धर्म कहते हैं। उदाहरण के लिए पुत्रधर्म, पितृधर्म, शिक्षकधर्म इत्यादि ।

मनुष्य का पंचमहाभूतात्मक जगत के प्रति, प्राणियों के प्रति, वनस्पतिजगत के प्रति जो कर्तव्य है वह भी धर्म कहा जाता है।

मनुष्य के इष्टदेवता, ग्रामदेवता, कुलदेवता, राष्ट्रदेवता होते हैं। इन धर्मों के अनेक प्रकार के आचार होते हैं। इन आचारों के आधार पर अनेक प्रकार के सम्प्रदाय होते हैं। इन संप्रदायों को भी धर्म कहते हैं।

सृष्टि की धारणा हेतु मनुष्य को अपने में अनेक गुण विकसित करने होते हैं। ये सद्गुण कहे जाते हैं। ये सद्गुण भी धर्म के आयाम हैं। इसीलिए कहा गया है …

धृतिक्षमा दमोस्तेयम् शौचमिन्द्रिय निग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।मनुस्मृति अ. ६।।

इन सभी आयामों में धर्म धारण करने का ही कार्य करता है ।

इन सभी धर्मों के पालन से व्यक्ति को और समष्टि को अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। अभ्युदय का अर्थ है सर्व प्रकार की भौतिक समृद्धि और निःश्रेयस का अर्थ है आत्यन्तिक कल्याण ।

(संदर्भ ग्रंथ -भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला १, भारतीय शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप , लेखन एवं संपादन – काटदरे इन्दुमति, पुनरुत्थान ट्रस्ट प्रकाशन , अहमदाबाद, जुलै २०१७)


2 प्रतिसाद ते “राम – भेट”

  1. अप्रतिम कविता आणि धर्म संकल्पना !

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  2. अत्यंत अभ्यासपूर्ण विवेचन… सोप्या भाषेत, नेमक्या शब्दात व अचूकतेने उलगडलेला धर्माचा अर्थ!!!

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