विविध भाषा – साहित्य – संस्कृतीचे एक दर्जेदार लोकपीठ !

शिवज्योत !


न दिसो न झिरपो न वाटो न काही | शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही
न ऐके ध्वनी न सूर न भाषाही पाही | शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

•| ॐ |•

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानंवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

चित् से होती है चेतना
कभी ना करना
उसकी अवधारणा
बस वही है आपकी
आत्मधारणा !
उसे पकड़ कर रहीए
अपने आप हो जाएगी
स्वात्मोद्धारणा !

श्रीकृष्णार्पणमस्तु!



भागवत सम्पर्क में आधा घंटा

नवजात

जीवन और योग- दोनों में ही, मनुष्य की सबसे बड़ी समस्याओं में एक है भगवान् के साथ सम्पर्क साधना, सम्पर्क की ऐसी पद्धति का निर्माण करना जिससे वह भगवान् का निर्देशन प्राप्त कर सके और तदनुसार कार्य कर सके। मनुष्य यह नहीं जानता कि सम्पर्क की पद्धति का निर्माण उसे नहीं करना है, उसे स्वयं सम्पर्क भी नहीं करना है। वस्तुतः भगवान् ही सम्पर्क पद्धति का निर्माण करते हैं, वे स्वयं ही तुम्हारे पास आते हैं। भगवान् ही तुम्हारी चेतना को व्यवस्थित करते हैं। जो कहना है, वे ही कहते हैं; जो करना है, वे ही करते हैं। तुम्हें तो उनसे जुड़ना भर है, उनकी ओर मुड़ना भर है। तुमसे केवल यही अपेक्षित है। शेष सब कुछ भगवान् करते हैं।

श्रीअरविन्द ने यही कहा है, “यदि मनुष्य आध्यात्मिक हो जाने की स्वीकृति प्रदान कर दे तो सब कुछ बदल जायेगा।” अतः सबसे प्रमुख चीज है तुम्हारी स्वीकृति : “मैं बदल जाना चाहता हूं, मैं परिपूर्ण होना चाहता हूं, मैं दिव्य हो जाना चाहता हूं।” और प्रमुख है स्वयं को भगवान् के हाथों में बहुत खुले और सच्चे ढंग से सौंप देना। तुम्हारी सारी इच्छाएं, सारी प्राथमिकताएं- मानवता की सेवा करने, सद्‌कार्य करने की इच्छा भी भगवान् की ओर तुम्हारे खुलने, उससे संबंध जोड़ने में, आड़े आती हैं।

मैं बहुत व्यावहारिक दृष्टि से तुम्हें जो सलाह दे सकता हूं, वह यह है कि प्रातःकाल जब उठो तो आधा घंटा भगवान् के साथ बिताओ। इसे अपने जीवन का नियम बना लो “मैं कम-से-कम आधा घंटा भगवान् के साथ बिताना चाहता हूं- केवल उनके साथ।” भगवान् के बारे में तुम्हारी जो भी अवधारणा हो, तुम्हारी जो भी कमियां हों, जो भी गतिरोध हों, शंकाएं हों, विश्वास की कमी हो कि भगवान् से जुड़ने या सम्पर्क स्थापित करने का कोई सरल उपाय संभव है- इन सबके बावजूद एक संकल्म करो “मैं प्रति दिन प्रातःकाल भगवान् के साथ आधा घंटा बिताना चाहता हूं, मैं भगवान् से बातचीत करना चाहता हूं, उनके सामने अपनी समस्याएं, अपनी अभीप्साएं रखना चाहता हूं ठीक वैसे ही जैसे अपने सबसे प्रिय और सबसे निकट व्यक्ति के सामने रख रहा होऊं और इस विश्वास के साथ कि भगवान् सर्वज्ञ और सर्वव्यापक हैं, वे मेरी बात सुनेंगे।” केवल एक दिन यह प्रयास करो और परिणाम देखो; तुम देखोगे कि तुम्हारे साथ क्या घट सकता है। केवल एक दिन आधा घंटा । यदि तुम यह कार्य एक दिन ढंग से कर को तो तुम सारे दिन सारी रात यही करना चाहोगे और अगले दिन भी, और फिर जीवन भर।

तुम में से जो तैयार है, जो सचमुन ही भगवान के द्वारा संचालित होने, परिपूर्ण होने की आवश्यकता अनुभव करते हैं, उनके लिये यह भगवान से एकत्व स्थापित करने का पहला और निर्णायक कदम है। तुम जानते हो कि हमारी चेतना में जन्म से, बचपन से और यहांतक कि पूर्वजन्मों से भी मानसिक स्तर पर अनेक ऐसे संस्कार स्थापित होते हैं जो भगवान के साथ हमारे सम्पर्क में बाधा उत्पन्न करते हैं। लेकिन यदि एक बार हम यह सम्पर्क साथ लें, तो भगवान उन संस्कारों को व्यवस्थित कर देते है, उनका परिष्कार कर देते हैं और तब हमारे लिये हर वस्तु कुछ भिन्न ही रूप घर लेती है। इसलिये तुम्हें यह समझ लेना चाहिये कि बाधाओं को दूर करने का यह सबसे सरल उपाय है, दूसरा हर उपाय कठिन तपस्या का है, बड़े परिश्रम का है। लेकिन इस तरह का पर्क और महानायक होगा कि भगवान नंदना में किस तरह विभिन्न चीजों को सुव्यवस्थित करते हैं।

जब तुम भगवान से बातचीत करते हो तो तुम्हें यह देखकर आश्चर्य होगा कि तुम्हारे विचारों में विद्यमान अपूर्णताएं भी गायब हो गयी हैं, तुम्हारी अभीप्साओं की कमियां लुप्त हो गयी है। तुम यह अनुभव करोगे कि तुम भगवान से जिस तरह की बातचीत का प्रयास कर रहे हो, वह भी अपूर्ण है; इसे तो दूसरा ही रूप लेना है।

इसलिये बस यही है जो मैं बहुत संक्षेप में तुमसे कहना चाहता हूं; भगवान से सम्पर्क साधना सीखो और प्रति दिन कम-से-कम आधा घंटा उनके साथ रहो। और चौबीस घंटों में यह सबसे अच्छा संबंध होगा आधा घंटा उनके साथ का संबंध। अतः इस अवसर पर मैं तुम सबके लिये श्रीमां और श्रीअरविन्द के विशेष आशीर्वाद की प्रार्थना करता हूं कि तुम अतिमानसिक आलोक और शक्ति के प्रति खुल सको। श्रीअरविन्द की चेतना तुम्हारे मन, जीवन और शरीर में जाग्रत् और व्यवस्थित हो तथा अपने को अभिव्यक्त करे जिससे तुम में गे प्रत्येक भगवान् की उपस्थिति और अभिव्यक्ति का प्रसार केन्द्र बन सके। भगवान् के आशीर्वाद तुम्हार साथ रहे।

३ जानेवारी १९८१ की एक वार्ता

With the Compliments of

Sri Aurobindo Society, Pondicherry – 605002


श्रीमत् आद्य शंकराचार्यविरचित

आत्मषटक

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमिवावशिष्यते ॥

हे (ब्रह्मतत्व) पूर्ण आहे हे (विश्व) पूर्ण आहे. पूर्णातून पूर्ण उत्पन्न झालेले आहे. (पूर्ण ब्रह्मातले पूर्ण घेऊन ही पूर्ण सृष्टी तयार केलेली आहे.) पूर्णातून पूर्ण घेतल्यावर पूर्णच रहाते.

मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।

न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मी (आत्मा) मन, बुध्दी, अहंकार किंवा चित्तरुप नाही. त्याचप्रमाणे मी कान, जीभ, नाक किंवा डोळे नाही. मी आकाश, पृथ्वी, तेज किंवा वायू नाही. मी तर मंगल करणारा कल्याणकारी चिदानंद रुप आहे.

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायु र्न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोशः ॥

न वाकपाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मी प्राण नाही, मी पाच वायू (प्राण, अपान, व्यान, उदान व समान) नाही, मी सात धातू (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र) नाही. मी पाच कोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनंदमय) नाही. त्याचप्रमाणे मी वाणी, हात, पाय, जननेंद्रिय किंवा गुदस्थान नाही. मी तर मंगल करणारा, कल्याणकारी चिदानंदरुप आहे.

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।

न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

माझ्या ठिकाणी द्वेष किंवा राग नाही, लोभ किंवा मोह नाही. त्याचप्रमाणे मद किंवा इर्षा नाही. माझ्यासाठी धर्म, अर्थ, काम किंवा मोक्ष यापैकी कोणताही पुरुषार्थ नाही. मी तर मंगल करणारा, कल्याणकारी चिदानंदरुप आहे.

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।

अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोहम् ।।

मला पुण्य नाही, पाप नाही, सुख किंवा दुःख होत नाही. त्याचप्रमाणे मला मंत्र, तीर्थ, वेद किंवा यज्ञ यांची गरज नाही. तसाच मी भोजन (क्रिया) भोज्य (पदार्थ) किंवा भोक्ता (क्रिया करणारा, उपभोगणारा) ही नाही. मी तर मंगल करणारा कल्याणकारी चिदानंदरुप आहे.

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः पिता नैव में नैव माता न जन्म ।

न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानंदरूपः शिवोहम् शिवोऽहम् ॥

मला मृत्यूची शंका (भिती नाही, माझ्या दृष्टीने जातीभेद नाहीत, मला वडील, आई नाहीत व जन्मही नाही. मला नातेवाईक, मित्र, गुरु किंवा शिष्य नाहीत. मी तर मंगल करणारा, कल्याणकारी चिदानंदरूप आहे.

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बंधः चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोहम् ।।

मी निर्विकल्प, निराकाररुप आहे (माझ्या ठिकाणी कोणताही संकल्प नाही, मला कोणताही आधार नाही) मी सर्व इन्द्रियातीत आहे. सर्व व्यापून राहिलेला मी विभू आहे, माझा सर्वत्र समभाव असतो. मला मुक्ती नाही तसच बंधनही नाही. मी तर मंगल करणारा कल्याणकारी चिदानंदरुप आहे.

योग विद्या धाम, नाशिक. योगभवन, कैवल्यनगरी, नाशिक – ४२२००५


।ॐ।

शिवोSहं

न दिसो न झिरपो न वाटो न काही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न ऐके ध्वनी न सूर न भाषाही पाही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

जाणे मन न गुण न अवगुण ते पाही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न रंग न रूप न वेश न भूषा कुठेही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

नातेगोते ना मैत्र ना रक्त विरक्ती ही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न धन न दान ना मान ना सन्मानही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न वाणी न बोल न गीत प्रीत जराही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न वीणामांगल्य पावित्र्य न चारित्र्यही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न शारदा सरस्वती केवळ लक्ष्मी ही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न राधाकृष्ण सीताराम न आरामही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

न जन्म न मृत्यू न सृजन विसर्जनही
शिवोSहं शिवोSहं शिवोSहं सदाही

संपूर्ण समर्पण !

श्रीकृष्णार्पणमस्तु !


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प्रवास पूर्णत्वाचा !


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विराम माझ्या असण्याला !


यावर आपले मत नोंदवा