त्वमेव माता पिता त्वमेव….

कृष्ण संदेश
सरलता, निर्मलता, परिपूर्णता,चक्रियता एवं सक्रियता भारतीय संस्कृति की विशेषता हैं|
संपूर्ण समर्पण माँ |
•| ॐ |•
मी त्या चैतन्यास इतके ‘जपले’
की वाटे सारे विश्व आपले
इतके त्या चैतन्याने मला ‘जपले’!
संपूर्ण समर्पण माँ!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
दि. ०१/११/२५
देवउठणी एकादशीच्या / कार्तिकी एकादशीच्या हार्दिक शुभेच्छा !
आनंदे पूजिला पंढरीचा राणा |
होऊनी विठ्ठल उभा माझा कान्हा ||
खुलली त्याची आज रूक्मिणी |
सांगेल ती आता एक नवी कहाणी ||
वृंदा आशय

•| ॐ |•
माँ– बेटी
बेटी : मॉं, मेरे मन में पौराणिक कथाओं को लेकर कुछ प्रश्न उठ रहे हैं|
मॉं : पूछो बेटी जो भी पूछना है|
बेटी : मॉं, कान्हा तो छोटा था ना जब राधा उसे संभालती थी |
मॉं : हां बेटी|
बेटी : फिर राधा कृष्ण की प्रिया कैसे कहलाई जा सकती है?
मॉं : तुम्हें एक बात पता है बेटी?
बेटी : कौनसी मॉं?
मॉं : जब कोई लड़का अपनी शादी के लिए लड़की पसंद करता है तो उसका रूप एवं गुण किस मिलते-जुलते होते हैं?
बेटी : उस लड़के की मॉं से|
मॉं : बिल्कुल सही है बेटा | ऐसा क्यों होता है, पता है?
बेटी : थोड़ा-थोड़ा |
मॉं : बताओ भला, क्या पता है आपको इस बारे में?
बेटी : कोई भी लड़का अपने संपूर्ण जिंदगी में अगर सबसे पहले कोई ‘स्त्री’ अनुभव करता है तो वह होती है ‘मॉं’ | शायद इसीलिए उसे अपना संपूर्ण जीवन जिसके साथ बिताना होता है, उस स्त्री में वह वही माता के रूप गुण खोजता है ; जिस लड़की में यह रूप गुण उसे मिल जाते हैं वहां उसके मन का समाधान होता है ; और शायद उसका चयन पूर्ण होता है|
मॉं : बहुत खूब मेरी बेटी!
बेटी : तो फिर मॉं कोई लड़की जब अपने लिए लड़का पसंद करती है, तो क्या वह उसके पिता के रूप एवं गुण उसमें ढूंढती है ?
मॉं : पता चला बेटा, ‘उपनिषद’ का जीवन में क्या महत्त्व है?
बेटी : मॉं, मेरी प्यारी मॉं | सब कुछ पता चल गया मॉं, ऐसा कहकर बेटी मॉं के गले लग गई |
हे ईश्वर, यह प्रेम निरंतर बढ़ता रहे, यही प्रार्थना कर मैं वहां से निकल पड़ी|
श्रीरामकृष्णार्पणमस्तु!
•| ॐ |•
माता सांगे देवा तुझे रूप
वर रंग काळा आत अप्रूप
भक्तहित हे वसे उभयमनी
का उगाच सोडून गेली
रुक्मिणी?
भक्तसाद ती ऐकून पुंडलिकाची
कर कटी ठेवून कथा सांगे विटेची
सोडून राधा,
गेला कृष्ण तिच्याच पाठी
कशा सुटतील जन्म गाठी?
सांगण्या,
गृहस्थाश्रमी कसे असावे ‘अंतर’
द्वैत साकारुनी उभे अद्वैत निरंतर!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु!

•|ॐ|•
वाणीत वसते
माता सरस्वती
धवल करतो
कृष्ण माझी मती
आयुष्याला मिळे गती
अन् जगाला नवी नीती
करू न शके मनुजा
तू ज्ञानावीण कधी प्रीती!
श्री माँ श्रीकृष्णार्पणमस्तु!

•| ॐ |•
कर ठेवून कटी…
लिही भविष्य लल्लाटी
माता पुसे ‘कोण’?
पिता राहे मौन |
तेथ म्हणे रुक्मिणी
ही साता जन्माची कहाणी
सुफळ संपूर्ण|
श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
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