
|| ॐ ||
श्री मॉं!
अंकावली
उलट्या गीनतिचा सोस
असा जडला मला भारी
अन् क्षणात बदलून गेली
मजसाठी अंकावली सारी
१० दाखविते दशेंद्रिये
अन् आठवतो दशानन
घाला सांगे लक्ष्मणरेषा
अचंबित होई रामानुजन
०९ दाखवे नवग्रह दशा
पुन्हा जिवंत होई आशा
गळून पडती सारे पूर्वग्रह
पिकत होता जिथे हशा
०८ सांगे बरेच काही
अष्टधा प्रकृती आणि
तोच तारण हार ही !
त्याला जो माने कोणी
०७ आठवड्याचे हे वार
होती एक दुसऱ्यावर स्वार
आता थांबावेच लागेल
जरी अंतर कापले फार !
०६ अध्यात्मातील रिपू
अन् खेळातला षटकार
ठाऊक नाही कधी कसा
कोणा भविष्या आकार?
०५ पंचायती पासून
पंचपकवान्नापर्यंत
पंचीपाळयापासून
कृष्णरक्षित द्रौपदी पर्यंत!
०४ हे तर सारे जीवन सार
जेथ वदे वेदज्ञान अपार
चातुर्वण्य – चार पुरुषार्थ
जीवन सारे होईल सार्थ
०३ सत्त्वरजतम हे त्रिगुण
येती घेऊन दत्तखूण
तीन तिघाडा काम बिघाडा
बालपणीची आठवण
०२ यात साठले द्वंद्व फार
जरी एकोSहम बहुस्याम
गळून पडतो जेव्हा काम
कळते तेव्हा राधेश्याम
०१ ही अद्वैताची वाटचाल
व्यवहारी स्पर्धेची चाल
वय विसरून मन बाल
तेव्हा एकत्वाकडे वाटचाल
वाटचाल जेव्हा संपते
तेव्हा अंकावली विरते
हळूहळू होते सारे शून्य
अन् समोर येते महाशून्य!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
संपूर्ण समर्पण मॉं!

शिल्पकार
नसलो जरी मी मूर्तिकार
कळला मला घडता शिल्पकार !
कळले मला छन्नी हातोडा
हवे तेव्हा जोडा हवे तेवढेच तोडा !
पाहता मूर्ती दिसे गणपती,
विठ्ठल रुक्माई, कधी शिवशक्ती !
नि:संग कृष्ण जरी आनंद आकंठ
जग उद्धाराया शिव होई नीलकंठ !
वृंदा आशय
•| ॐ |•
श्री मॉं!
राधा है एक धारा
कृष्ण के बहाव की
कैसे पहचाना जाए
उन्हें अलग एक दूसरे से?
कान्हा शब्द में ही
हैं राधा का कहना
और राधा में ही तो है
कृष्ण का थामना
फिर किसे पहचानना ?
एक दूसरे की आंखों में
उतरकर
चले जाते हैं दोनों
परा के पर
यूं ही लोग
अपनी आंखें बंद नहीं करते
उनका दर्शन लेते समय
क्योंकि उन्हें पता होता है
यह तो उस दिव्य प्रेम का दर्शन है
जो बहता है हृदय से हृदय की ओर
जहां थम जाती है चंचल लहरे
एवं सारा शोर
उमड़कर आती है एक ऐसी सादगी
जहां सुंदरता पाती है
एक नई जिंदगी !
श्रीरामकृष्णार्पणमस्तु!
संपूर्ण समर्पण मॉं!

•| ॐ |•
श्री मॉं!
कितनी है गहराई
राधा जी
आपकी आंखों में!
आंखों में या दृष्टि में
दृष्टि में या सृष्टि में
सृष्टि में या दर्शन में
दर्शन में या हर्षण में
राधा जी
आपकी आंखों में
या आपका दर्शन लेने वाले
मेरे मन में; कितनी गहराई है !
संपूर्ण समर्पण मॉं!
श्रीरामकृष्णार्पणमस्तु!
•|ॐ|•
श्री मॉं!
सखी कान्हा के साथ
कान्हा : क्या बात है सखी आप चाय नही पी रहे हो?
सखी : दांतों में बड़ा दर्द हो रहा है कान्हा|
कान्हा : आपने दवाई तो ली थी सुबह?
सखी : हम पर दवाई कोई असर नहीं करती शायद|
कान्हा : यह हो सकता है आप हो ही अलग किस्म के|
सखी : क्या कहा?
कान्हा : कुछ नहीं|
कान्हा : सखी हम सोच रहे थे, “आप चाय बनाते हो लेकिन, आप पी नहीं सकते तो आपको कैसा लगता होगा?”
सखी : कुछ नहीं लगता कान्हा|
कान्हा : कुछ भी नहीं?
सखी : बिल्कुल नहीं|
कान्हा : क्यों?
सखी : क्योंकि हम चाय पीते हैं वह चाय पसंद है इसलिए नहीं, तो उस बहाने आपसे बातें होती है इसलिए|
कान्हा : (खुश होकर कह दिया) यह तो बड़ी अच्छी बात है सखी, कि हम आपको चाय से ज्यादा प्रिय हैं |
सखी : हां कान्हा बिल्कुल उसी तरह जिस तरह रूक्मिणी आपको नमक से ज्यादा पसंद हैं|
(कान्हा और सखी बड़े दिनों के बाद खुलकर जोर जोर से हंसने लगे। और मैं मॉं से प्रार्थना करती रही उनकी खुशियां खुशियां ही रहने के लिए)
संपूर्ण समर्पण मॉं!

•| ॐ |•
श्री मॉं!
हसला तरी कृष्ण
रुसला तरी कृष्ण
दिसला तरी कृष्ण
न दिसला तरी कृष्ण
न पडे मज प्रश्न
कुठे माझा कृष्ण ?
वर्षण तरी कृष्ण
अवर्षण तरी कृष्ण
हर्षण तरी कृष्ण
दर्शन तरी कृष्ण
दर्पणात कृष्ण तर्पणात कृष्ण
न पडे मज प्रश्न काय करे कृष्ण?
सुखात माझा कृष्ण
दुःखात माझा कृष्ण
आवर्जून म्हणे कृष्ण
आर्जवात दिसे कृष्ण
न पडे मज कधीही प्रश्न
मज काय देई माझा कृष्ण?
श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
संपूर्ण समर्पण मॉं!
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